गंगा के देश में पर्यावरण रक्षा का पाठ पढ़ानेवाले टहल रहे हैं. औसतन दिल्ली में हर रोज कोई न कोई सेमीनार और गोष्ठी इस बात पर होती है कि देश का पर्यावरण खतरे में है. कुछ देशी-विदेशी संस्थाएं इस बात की ठेकेदार बन गयी हैं कि वे पर्यावरण रक्षा का पाठ पढ़ायेंगी. क्या मीडिया, क्या नेता और क्या नौकरशाही सभी इन संस्थाओं को माई-बाप का दर्जी दिये हुए हैं. और इन सबके पीछे का खेल क्या है जानते हैं? यह सब पैसे के लिए हो रहा है. पैसे के बल पर पर्यावरण बिगाड़नेवाले अब पर्यावरण रक्षा की बात कर रहे हैं.
पहले थोड़ा गंगा के बारे में जान लें जो भारत में पर्यावरण और पानी की समझ का आधार है. गंगा की कुल लंबाई 2525 किलोमीटर है. और यह अपने रास्ते में 10 लाख 60 हजार वर्ग किलोमीटर का नदी बेसिन तैयार करती है. इसके कारण 5.80 करोड़ हेक्टेयर जमीन अत्यंत उपजाऊ है. यह अकेली नदी भारत के 26.2 प्रतिशत हिस्से को छूती है. यह बताने की जरूरत नहीं है कि गंगा केवल भूभाग पर ही नहीं लोगों के दिलों में भी बहती है. इसके कारण आर्थिक हैं जो भावनात्मक रूप लिए हुए हैं.
गंगा से जुड़ी स्नान पर्वों की ऐसी श्रृंखला है कि देश के हर हिस्से का कोई न कोई आदमी किसी न किसी बहाने गंगा से जुड़ा ही रहता है. गोमुख लेकर गंगासागर तक गंगा केवल जमीन को ही पवित्र नहीं करती, यह लोगों के दिलों को भी पवित्र करती है. इसी का परिणाम है कि एक ऐसा भारतीय जो अपने उद्योग का सारा कचरा गंगा में बहाता है लेकिन अपनी आत्मा की पवित्रता के लिए गंगास्नान करता है. एक बात जान लीजिए कि यह केवल उद्योगपतियों और शहरी लोगों पर ही लागू होता है. ग्रामीण इलाकों में रहनेवाले भारतीय गंगास्नान से तन-मन पवित्र करता है और उसकी पवित्रता का भी पूरा ध्यान रखता है. गोमुख से गंगासागर तक की पदयात्रा करनेवाले स्वामी अवधेशानंद ने एक बार कहा था कि पूरी यात्रा के दौरान उन्हें एक गांव भी ऐसा नहीं दिखा जिसका गंदा नाला सीधे गंगा में गिरता हो. और तो और कोई घर ऐसा नहीं है जिसके नापदान का मुंह गंगा की ओर खुलता हो.
ऐसे गंगा-प्रेमियों को पर्यावरण की शिक्षा देना कितना न्यायसंगत है? एक आम भारतीय अपनी नदियों, वृक्षों के बारे में सहज रूप से उतना जानता है जितना आमतौर पर पर्यावरण पर मास्टर डिग्री लेने के बाद लोगों को पता चलता है. लेकिन आज हालात यह हैं कि डिग्री लेनेवाला एक्सपर्ट बन जाता है और एक आम भारतीय जो सहज रूप से अपने पर्यावरण के बारे में सचेत रहता है उसको शिक्षा देने पहुंच जाता है.
पर्यावरण की भारतीय समझ ज्यादा गहरी और सात्विक है. पश्चिम के पर्यावरण के जानकार संकट से उबरने के लिए पर्यावरण सुरक्षा का आंदोलन चलाते हैं. हमारे संस्कार में परंपरागतरूप से पर्यावरण रचा-बसा है. पर्यावरण की हमारी समझ में खोट आया है तो इसके लिए दोषी कोई और नहीं लंबे समय की हमारी गुलामी है जिसके कारण हमारा आत्मविश्वास डगमगा गया. इसका परिणाम यह हुआ कि हम वह सब सीखने लगे जो पश्चिम के लोग हमको सिखाने लगे.
पहले से ही हमारी सोच में केवल इंसान नहीं है, हम लोक के लिए सोचते हैं. पश्चिम में पर्यावरण की चिंता इसलिए है क्योंकि अब आदमी पर संकट आ गया है. भारत में संकट आये ही नहीं इसके लिए संस्कारों की समृद्ध परिपाटी चली आ रही है. लेकिन ये पानी और पर्यावरण आंदोलनवाले हमारी उस समझ में भी खोट निकाल कर अपने हिसाब से पर्यावरण बचाने की जुगत लगा रहे हैं. इस जुगत में पर्यावरण कहीं नहीं है. इस जुगत में पैसा है, पैसे का हिसाब-किताब और उस पैसे से देश के प्राकृतिक संसाधनों पर परोक्षरूप से विदेशियों को कब्जा दे देने का खेल है. देश में शायद ही कोई पर्यावरण आंदोलन हो जिसको चलाने के लिए विदेश से पैसा न आ रहा हो.
क्या पैसे से पर्यावरण बचता है. पैसे से पर्यावरण बचता नहीं बर्बाद होता है. पर्यावरण बचता है संस्कार से और वह संस्कार एक आम भारतीय में बहुत पुख्ता है. अगर हम अपने संस्कार में जीते हैं तो हम भी बचेंगे और हमारा पर्यावरण भी.