नये सिरे से कंपनीराज

25 06 2007

दुनिया के जिस भी हिस्से में मैं जाता हूं वहां के सामान्य लोगों में एक सार्वभौमिक धारणा देखी है. वह यह कि जिन संस्थाओं पर उनकी जिंदगी निर्भर है वे उनका साथ नहीं दे रही हैं. उन सबको अपने और अपनी आनेवाली पीढ़ियों के भविष्य का डर सता रहा है. अमेरिका में भी यह डर है और उनके नागरिकों में यह साफ दिखने लगा है. वे अब मतदान से कतराने लगे हैं, राजनीतिक प्रणाली में अमरीकी नागरिकों की रूचि कम होती जा रही है. इस बात का सरलीकरण नहीं किया जा सकता. इसके मूल में समस्याएं गंभीर हैं.

हालांकि मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस बात का शोर अक्सर मचता है कि गरीबी बढ़ रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है, गैरबराबरी, हिंसा, अपराध, एकांगी जीवन और आखिर में पर्यावरण विनाश सब कुछ पनप रहा है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से मीडिया और राजनेता दोनों ही इन समस्याओं को सुलझाने के लिए रणनीतिक रूप से कोई पहल नहीं करते. नेताओं के सामने पुराने और घिसे-पिटे विकास को तेज करने, इसके लिए जरूरी उपायों को तेज करने और कानून व्यवस्था सुधारने के दकियानूसी नारे के अलावा कुछ खास सूझता नहीं है.

अक्सर सत्ता के गलियारे से दूर रहनेवाले लोग परिस्थितियों और सच्चाईयों का ज्यादा सटीक आंकलन कर लेते हैं. लेकिन इनके सोचने और समझने का व्यापक स्तर पर कोई परिणाम नहीं निकल पाता है. क्योंकि ऐसे लोगों का ऊंचा नाम है और ही मीडिया में ऐसी पहुंच कि जिस सत्य को वे समझ गये हैं उसे उसी तरीके से दुनिया को बता सकें. ऐसे लोगों को सत्य का आभास होता है फिर भी वे अपने-आप को एकाकी औऱ असहाय महसूस करते हैं. मुझे जो सवाल परेशान करता है वह यह कि क्या चीजें सचमुच उतनी खराब हो गयी हैं जितनी मुझे लगती हैं? और लोगों को ऐसा क्यों नहीं लगता? क्या मुझे जानबूझकर गलत बातें बताई गयी हैं या फिर मैं एक मूर्ख हूं?

अपने अकेलेपन के साथ मैं पिछले कई वर्षों से इन्हीं सवालों से जूझ रहा हूं. लाखों लोग और भी हैं जो इन्हीं सवालों पर सोच-विचार कर रहे हैं. फिर भी मुझे हमेशा एक झिझक रहती है. मैं जो कुछ कहूंगा कहीं उसे विकास, व्यवसाय और आधुनिकता के नाम पर खारिज तो नहीं कर दिया जाएगा? लेकिन एक बात मैं जानता हूं कि अज्ञात का भय जहां हमें जड़ बनाता है, वहीं सत्य हमें सक्रिय होने की शक्ति देता है

मेरी जागृति का पहला कदम उठा आधुनिक क्रांतियों के पाठ्यक्रम से जिसने मेरी आंखें खोल दी. मैं जिस विकास के कारण सुख भोग रहा था वह दुनिया में कितने लोगों को मिल सकती हैं? १९६१ की गर्मियों में मैं इन्डोनेशिया के दौरे पर गया था. वहां जाने के बाद मुझे विकास की हकीकतों का अंदाज लगा. मैं पहली बार वहां जीवन को नये नजरिये से देख रहा था जो भयंकर गरीबी में भी आध्यात्मिकता और संघर्षपूर्ण जीवनशैली के कारण हमसे ज्यादा उदार मानवीय दृष्टिकोण रखते थे.

दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपने लंबे प्रवास के कारण मैं यह देख सका कि जब विकास की पहल आम लोगों के हाथ होती है तो कैसे लोग और समुदाय अपने दम पर ताकत बटोर लेते हैं. मैंने सीधे तौर पर इसका अनुभव किया है कि विदेशी पूंजी के कारण लोगों की यह पहल दब जाती है. इन अनुभवों से मेरी निष्ठा पक्की हो गयी कि विदेशी धन की मदद से सच्चा विकास नहीं खरीदा जा सकता. लोगों का विकास हो सकता है लेकिन तब जब उन्हें अपने विवेक के आधार पर अपनी भूमि, पानी, श्रम, तकनीकि आदि को समायोजित करने का मौका मिले. लेकिन ज्यादातर विकास कार्यक्रमों में स्थानीय लोगों के हाथ से उनके संसाधन छिनते जा रहे हैं. ये संसाधन ऐसे लोगों के हाथ में केन्द्रित होते जा रहे हैं जिनका स्थानीय जरूरतों और लोगों से दूर-दूर का कोई वास्ता नहीं है.

ये कंपनियां कभी उपयोगी संस्थान हुआ करते थे लेकिन बाजार की शक्तियों ने उन्हें आतंक के हथियार में बदल दिया है. यह आतंक पूरे पृथ्वी पर फैला हुआ है. यह रोजगार नष्ट कर रहा है, लोगों का विस्थापन कर रहा है, लोकतात्रिक संस्थानों को नपुंसक बना रहा है और धन की अतृप्त लिप्सा में जीवन को निचोड़ रहा है. दरअसल समस्या तो व्यवसाय की है और बाजार की. समस्या है ऐसे वैश्विक तंत्र की जो मानवीय नियंत्रण से दूर घूम रही है. इस व्यवस्था का तंत्र इतना शक्तिशाली और विकृत बन गया है कि अब बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रबंधक चाहें भी तो यह धुरी पर नहीं लौट सकता.

डेविड सी कोर्टिन
लेखक, when corporations rule the world